
जब संविधान की रक्षा करने वाला खुद इस्तीफा दे… तो समझ जाइए अंदर कुछ बहुत गड़बड़ है। उपराष्ट्रपति का जाना क्या सिर्फ स्वास्थ्य कारण है, या सत्ता से टकराव का नतीजा?
1. अचानक इस्तीफा – सवालों का तूफान
21 जुलाई की रात उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अचानक इस्तीफा दे दिया। बताया गया कि ये “स्वास्थ्य कारणों” की वजह से हुआ। लेकिन राजनीति के गलियारों में ये महज़ एक बहाना माना जा रहा है।
क्यों?
क्योंकि इस्तीफे से ठीक पहले, उन्होंने संसद में एक संवेदनशील न्यायिक प्रस्ताव (जस्टिस वर्मा मुद्दा) को लेकर आपत्ति जताई थी – और सत्ता पक्ष से उनका स्वर टकरा रहा था।
2. विपक्ष का सवाल – ‘स्वास्थ्य नहीं, सत्ता दबाव वजह है’
कांग्रेस, JMM और TMC जैसे दलों ने साफ कहा है:
“धनखड़ साहब का इस्तीफा सामान्य नहीं है। यह दर्शाता है कि वो सरकार के दबाव में थे – और असहमति की कोई जगह नहीं थी।”
— जयराम रमेश
“जब उपराष्ट्रपति जैसे वरिष्ठ नेता को बीच कार्यकाल में हटना पड़े, तो सवाल सरकार पर उठते हैं, संविधान पर नहीं।”
— पी. चिदंबरम
3. क्या सत्ता नहीं चाहती कोई स्वतंत्र आवाज़?
धनखड़, जो पहले सरकार समर्थक माने जाते थे, पिछले कुछ समय से कई मामलों पर स्वतंत्र रुख अपना रहे थे:
- उन्होंने राज्यसभा में विपक्ष को बोलने का बराबर मौका दिया।
- न्यायिक प्रक्रिया और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर बार-बार टिप्पणी की।
- सरकार के कुछ विधेयकों पर बिना समर्थन के गवर्निंग स्टेटमेंट नहीं दिए।
यह सब सत्ता पक्ष को रास नहीं आ रहा था।
4. अंदरखाने की खबरें – डील या दबाव?
सूत्रों की मानें तो:
- उन्हें नोटिस भेजने, कार्यभार सीमित करने और भावी लोकसभा स्पीकर या राष्ट्रपति पद के लिए नाम हटाने की बातों पर सहमति का दबाव बनाया गया।
- अंत में, उन्होंने “इस्तीफा” को ही रास्ता चुना – शायद अपने सम्मान की रक्षा के लिए।
ये लोकतंत्र के लिए चेतावनी है
जब देश का उपराष्ट्रपति — जो संविधान का संरक्षक माना जाता है — स्वस्थ होते हुए भी, पद छोड़ने को मजबूर होता है, तो यह सिर्फ “व्यक्तिगत निर्णय” नहीं होता।
ये सत्ता के केंद्रीयकरण और विरोध की आवाज़ों को कुचलने की प्रवृत्ति का संकेत हो सकता है।




