उत्तर प्रदेश

एसआईआर अभियान में सुस्ती पड़ेगी भारी… भाजपा विधायकों की टिकट पर लटकी तलवार!

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में टिकट पाने को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विधायकों की भी नींद उड़ी हुई है क्योंकि विशेष मतदाता पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान को लेकर सियासी सरगर्मी बढ़ गई है।

भाजपा सूत्रों के मुताबिक़ कुछ विधानसभा क्षेत्रों में मतदाता नाम जोड़ने की रफ्तार अपेक्षाकृत कम पाई गई है, जिस पर प्रदेश और केंद्रीय नेतृत्व दोनों स्तरों पर समीक्षा की जा रही है। सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा में इसे 2027 के विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। पार्टी नेतृत्व ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि एसआईआर में लापरवाही या सुस्ती दिखाने वाले विधायकों और दावेदारों के लिए अगला चुनावी रास्ता आसान नहीं होगा।

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, एसआईआर के तहत मतदाता सूची में नाम जोड़ने और त्रुटियों के सुधार की प्रक्रिया पर केंद्रीय नेतृत्व तक नियमित रिपोर्ट पहुंच रही है। इस रिपोर्ट में यह आकलन किया जा रहा है कि कौन विधायक और संभावित प्रत्याशी अपने क्षेत्र में कितनी सक्रियता से अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं। कमजोर प्रदर्शन करने वालों को लेकर संगठन स्तर पर चिंता जताई जा रही है।

भाजपा नेतृत्व का मानना है कि मतदाता सूची चुनावी सफलता की बुनियाद होती है। ऐसे में जिन विधानसभा क्षेत्रों में एसआईआर के दौरान अपेक्षित संख्या में नाम नहीं जुड़ रहे हैं या अभियान की गति धीमी है, वहां संबंधित विधायकों की कार्यशैली पर सवाल उठना तय है। पार्टी के अंदरखाने यह भी चर्चा है कि एसआईआर में निष्क्रियता 2027 में टिकट के लिए नकारात्मक संकेत मानी जाएगी।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहले ही संगठन और जनप्रतिनिधियों को स्पष्ट निर्देश दे चुके हैं कि एसआईआर अभियान को पूरी गंभीरता के साथ लिया जाए। उनका जोर इस बात पर रहा है कि पात्र मतदाताओं का नाम हर हाल में सूची में जुड़े और किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त न की जाए। सूत्र बताते हैं कि कुछ विधानसभा क्षेत्रों में मतदाता नाम जोड़ने की रफ्तार अपेक्षाकृत कम पाई गई है, जिस पर प्रदेश और केंद्रीय नेतृत्व दोनों स्तरों पर समीक्षा की जा रही है। आने वाले दिनों में कमजोर प्रदर्शन वाले क्षेत्रों के जनप्रतिनिधियों से जवाब-तलब भी हो सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा एसआईआर को महज प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि संगठन की सक्रियता और जनसंपर्क क्षमता की परीक्षा के तौर पर देख रही है। यही वजह है कि एसआईआर में प्रदर्शन को 2027 के चुनावी गणित से सीधे जोड़कर आंका जा रहा है।

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