
एक भावनात्मक अभियान, जो बन गया जन आंदोलन
भारत में मातृत्व और प्रकृति दोनों को सदियों से जीवनदायिनी माना गया है। इन्हीं दोनों तत्वों की महत्ता को जोड़ने वाला राष्ट्रीय अभियान है — “एक पेड़ माँ के नाम”, जिसकी शुरुआत माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून 2024) को की।
इस अभियान ने वृक्षारोपण को भावनात्मक और सामाजिक चेतना के स्तर पर एक आंदोलन में बदल दिया है, जिसमें हर नागरिक को अपनी माँ के नाम एक पौधा लगाकर न केवल प्रकृति से जोड़ने का संदेश दिया गया, बल्कि पर्यावरणीय उत्तरदायित्व की भावना भी पैदा की गई।
उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक योगदान
उत्तर प्रदेश सरकार ने इस अभियान को “एक पेड़ माँ के नाम 2.0” के रूप में व्यापक स्तर पर लागू किया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के नेतृत्व में 9 जुलाई 2025 को 37 करोड़ पौधे एक दिन में लगाने का लक्ष्य रखा गया — यह अपने आप में एक विश्व रिकॉर्ड की दिशा में कदम है।
उत्तर प्रदेश पहले ही 2024–25 में 39.5 करोड़ पौधारोपण कर भारत में अग्रणी राज्य बन चुका है।
इस पूरे अभियान को GPS ट्रैकिंग, जियो-टैगिंग, और कार्बन क्रेडिट व्यवस्था जैसे अत्याधुनिक तकनीकी उपायों से जोड़ा गया है, ताकि पारदर्शिता और दीर्घकालिक प्रभाव सुनिश्चित किया जा सके।
जमौली (जौनपुर) में वृहद पौधरोपण कार्यक्रम
मुख्यमंत्री के अभियान को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. आर.पी. सिंह ने अपने पैतृक ग्राम जमौली (जनपद जौनपुर) में एक भव्य वृक्षारोपण कार्यक्रम की शुरुआत की।
इस कार्यक्रम का आयोजन सृजन सामाजिक विकास न्यास के तत्वावधान में हुआ, जिसमें आम, पीपल, बरगद, नीम, बेल, पाकड़, अर्जुन और औषधीय पौधों सहित सैकड़ों पौधे लगाए गए। एक सघन वन के रूप में इसे विकसित करने का संकल्प लिया गया।
डॉ. आर.पी. सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि:
“पर्यावरण संरक्षण अब टालने का विषय नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी है। साथ ही गंगा व सहायक नदियों की रक्षा में सभी की सहभागिता आवश्यक है।
उन्होंने यह भी बताया कि गंगा स्वच्छता अभियान को सफल बनाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
गंगा हरीतिमा ब्रांड एम्बेसडर अनिल सिंह ने इस अवसर पर कहा:
“एक-एक पौधा हमारे जीवन के लिए धरोहर है, और इसे संजोकर रखना हमारा परम कर्तव्य है।”
नया भारत, हरित भारत
“एक पेड़ माँ के नाम” एक ऐसा आंदोलन है जो संवेदना, पर्यावरणीय चेतना और सांस्कृतिक मूल्य को एक साथ जोड़ता है।
आइए, एक पेड़ अपनी माँ के नाम लगाएं।
प्रकृति, संस्कृति और भावी पीढ़ियों के संरक्षक बनें।




