
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों की स्थिति, उनके प्रशासन और शैक्षणिक गुणवत्ता को लेकर समय-समय पर सरकार, कुलपतियों और विश्वविद्यालय प्रशासन से जवाबदेही की अपेक्षा की जाती रही है। लेकिन इस पूरी व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पद—राज्यपाल एवं राज्य विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति—की भूमिका पर भी गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है।
उत्तर प्रदेश में राज्यपाल अधिकांश राज्य विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति हैं। राजभवन की आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, कुलाधिपति के रूप में राज्यपाल की भूमिका केवल दीक्षांत समारोहों या औपचारिक दायित्वों तक सीमित नहीं है। कुलपतियों की नियुक्ति, विश्वविद्यालयों से संबंधित अपीलों तथा कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक मामलों में कुलाधिपति की भूमिका निर्धारित है।
ऐसे में सवाल यह है कि यदि विश्वविद्यालयों की व्यवस्था में कहीं कमी रह जाती है, प्रशासनिक अनियमितताएं सामने आती हैं, शैक्षणिक गुणवत्ता अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंचती या विश्वविद्यालयों को उत्कृष्टता की दिशा में अपेक्षित गति नहीं मिलती, तो केवल कुलपतियों या विश्वविद्यालय प्रशासन को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त कैसे हो सकता है?
जवाबदेही व्यवस्था के शीर्ष स्तर से भी तय होनी चाहिए।
श्रीमती आनंदीबेन पटेल 29 जुलाई 2019 से उत्तर प्रदेश की राज्यपाल हैं और वर्तमान में भी राज्यपाल एवं कुलाधिपति के रूप में कार्यरत हैं। जुलाई 2026 में उनके सात वर्ष का कार्यकाल पूरा होने की खबरें भी सामने आईं।
इस लंबे कार्यकाल को देखते हुए यह स्वाभाविक प्रश्न है कि उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में उनके कार्यकाल के दौरान क्या ऐसे ठोस और व्यापक सुधार हुए, जिनका प्रभाव देश के अग्रणी विश्वविद्यालयों की तरह स्पष्ट रूप से दिखाई देता हो? यदि विश्वविद्यालयों की कमियों के लिए कुलपतियों से जवाब मांगा जाता है, तो कुलाधिपति की भूमिका और उत्तरदायित्व पर सार्वजनिक विमर्श क्यों न हो?
यह सवाल किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए उठाया जाना चाहिए।
राज्यपाल स्वयं सार्वजनिक मंचों से शिक्षा, विश्वविद्यालयों और युवाओं के भविष्य को लेकर लगातार अपने विचार रखती रही हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय व्यवस्था के संबंध में भी उनके कार्यकाल का एक व्यापक और निष्पक्ष मूल्यांकन होना चाहिए—कितने विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक सुधार हुए, शैक्षणिक गुणवत्ता में कितना सुधार आया, शोध एवं नवाचार को कितना प्रोत्साहन मिला, विश्वविद्यालयों की राष्ट्रीय रैंकिंग और अकादमिक प्रदर्शन में क्या परिवर्तन आया तथा कुलपतियों की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने के लिए कौन-से संस्थागत कदम उठाए गए।
राष्ट्रपति से अपील
ऐसे में राष्ट्रपति से अपेक्षा है कि वह इस विषय को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय संस्थागत सुधार के दृष्टिकोण से देखें। राज्य सरकार को विश्वविद्यालयों के प्रदर्शन, कुलपतियों की जवाबदेही और कुलाधिपति की भूमिका को लेकर एक स्वतंत्र एवं तथ्यपरक समीक्षा करानी चाहिए।
यदि किसी संवैधानिक पदाधिकारी को लगता है कि किसी संस्था की व्यवस्था अपेक्षित रूप से नहीं चल रही है, तो उस संस्था के प्रमुख स्तर पर भी जिम्मेदारी स्वीकार करने की परंपरा होनी चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही केवल अधीनस्थ अधिकारियों की नहीं, बल्कि निर्णय वाले प्रत्येक स्तर की होनी चाहिए।
इसी संदर्भ में यह मांग भी उठ रही है कि यदि राज्यपाल अपने कार्यकाल के दौरान विश्वविद्यालयों की व्यवस्था में अपेक्षित सुधार सुनिश्चित नहीं कर सकीं, तो उन्हें नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए पद से इस्तीफा देने पर विचार करना चाहिए।
हालांकि, यह भी स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि राज्यपाल का इस्तीफा देना या उन्हें पद से हटाना संवैधानिक प्रक्रिया का विषय है। इसलिए इस मांग को राजनीतिक दबाव के बजाय नैतिक और संस्थागत जवाबदेही की मांग के रूप में देखा जाना चाहिए।
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में विश्वविद्यालय केवल डिग्री प्रदान करने वाली संस्थाएं नहीं हैं। वे लाखों युवाओं के भविष्य, शोध, रोजगार, नवाचार और राज्य के बौद्धिक विकास की आधारशिला हैं। इसलिए इन संस्थाओं की जवाबदेही तय करने में किसी भी स्तर को प्रश्नों से परे नहीं रखा जा सकता।
सवाल सीधा है—जब विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी कुलपतियों तक जाती है, तो कुलाधिपति की जवाबदेही कहां तक जाती है?
अब समय है कि इस प्रश्न का उत्तर राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि तथ्यों, प्रदर्शन और संवैधानिक जिम्मेदारी के स्पष्ट मूल्यांकन से दिया जाए।




