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राज्यसभा में राघव चड्ढा ने उठाई आम लोगों की रोजमर्रा की चिंताएं, व्यावहारिक सुधारों का दिया सुझाव

आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने सोमवार को संसद में आम भारतीयों की तीन “रोजमर्रा की चिंताओं” का मुद्दा उठाते हुए सरकार से व्यावहारिक सुधार लागू करने की मांग की।

राज्यसभा में बजट सत्र के दौरान बोलते हुए, उन्होंने तीन प्रमुख सुझाव दिए, जिनमें पति-पत्नी के लिए वैकल्पिक संयुक्त आयकर रिटर्न दाखिल करने की व्यवस्था, घायल सैनिकों की दिव्यांगता पेंशन पर पूरी तरह कर छूट और बैंक खातों में न्यूनतम बैलेंस न रखने पर लगने वाले जुर्माने को खत्म करना शामिल थे।

चड्ढा ने कहा कि ये तीनों मुद्दे देश के लाखों लोगों को सीधे प्रभावित करते हैं और इनमें नीतिगत बदलाव से व्यवस्था अधिक न्यायसंगत और मानवीय बन सकती है।

उन्होंने कहा कि भारत में फिलहाल पति-पत्नी को अलग-अलग आयकर रिटर्न दाखिल करना पड़ता है, जिससे उन परिवारों को नुकसान होता है जहां दोनों की आय बराबर नहीं होती।

चड्ढा के मुताबिक कई घरों में एक व्यक्ति की आय अधिक होती है, जबकि दूसरा बहुत कम कमाता है या कमाता ही नहीं। ऐसे में अधिक कमाने वाले पर कर का बोझ ज्यादा पड़ता है क्योंकि दोनों की आय को जोड़कर टैक्स नहीं लगाया जाता।

उन्होंने कहा कि अमेरिका और जर्मनी जैसे कई देशों में पति-पत्नी को संयुक्त रूप से आयकर दाखिल करने की अनुमति है, जिससे टैक्स स्लैब का बेहतर लाभ मिलता है और परिवार पर कुल कर बोझ कम हो सकता है। उनके अनुसार भारत में भी वैकल्पिक संयुक्त फाइलिंग लागू करने से परिवारों को आर्थिक रूप से मदद मिलेगी।

दूसरा मुद्दा उठाते हुए चड्ढा ने कहा कि पहले सेवा के दौरान घायल सैनिकों को मिलने वाली दिव्यांगता पेंशन पूरी तरह से आयकर मुक्त होती थी।

उन्होंने कहा कि हाल में नीति में बदलाव के बाद पूर्ण कर छूट केवल उन सैनिकों को मिलती है जिन्हें चोट के कारण सेवा से मेडिकल आधार पर बाहर कर दिया जाता है।

उनके मुताबिक जो सैनिक चोट के बावजूद सेवा जारी रखते हैं या बाद में सामान्य रूप से सेवानिवृत्त होते हैं, उन्हें अपनी दिव्यांगता पेंशन के कुछ हिस्से पर कर देना पड़ता है। उन्होंने इसे अन्यायपूर्ण बताते हुए कहा कि देश की सेवा करते हुए लगी चोटों पर मिलने वाले लाभों को सैनिक की सेवा स्थिति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

चड्ढा ने सरकार से सेवा से जुड़ी चोटों पर मिलने वाली दिव्यांगता पेंशन को सभी सैनिकों के लिए 100 प्रतिशत आयकर मुक्त करने की मांग की।

तीसरे मुद्दे के रूप में उन्होंने बैंक खातों में न्यूनतम बैलेंस न रखने पर लगने वाले जुर्माने को खत्म करने की बात कही।

उन्होंने कहा कि बैंक अक्सर ग्राहकों से न्यूनतम बैलेंस न रखने पर हर महीने सैकड़ों से लेकर हजार रुपये तक का शुल्क वसूलते हैं, जिससे कम आय वाले लोगों, ग्रामीणों और छोटे खाताधारकों पर ज्यादा असर पड़ता है।

चड्ढा ने कहा कि शहरों में बैंक शाखाएं आमतौर पर 5,000 से 10,000 रुपये तक न्यूनतम बैलेंस रखने को कहती हैं, जबकि अर्धशहरी क्षेत्रों में यह 3,000 से 4,000 रुपये और ग्रामीण क्षेत्रों में 1,000 से 3,000 रुपये तक होता है।

उन्होंने बताया कि यदि यह बैलेंस नहीं रखा जाता तो 50 से 600 रुपये तक का जुर्माना लगाया जाता है और इस शुल्क पर 18 प्रतिशत जीएसटी भी लिया जाता है।

उन्होंने कहा, “बैंक खातों का उद्देश्य लोगों को वित्तीय सुरक्षा देना है, लेकिन इस व्यवस्था में गरीबों को ही सजा मिल रही है।”

चड्ढा ने कहा कि इस तरह के जुर्माने वित्तीय समावेशन के लक्ष्य के विपरीत हैं और लोगों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से दूर करते हैं।

उन्होंने सरकार से विशेष रूप से बेसिक सेविंग अकाउंट के लिए न्यूनतम बैलेंस का जुर्माना पूरी तरह खत्म करने की अपील की।

अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि जैसे किसानों के कर्ज माफ किए जाते हैं, उसी तरह न्यूनतम औसत बैलेंस (एमएबी) पर लगने वाले बैंक शुल्क को भी खत्म किया जाना चाहिए, ताकि गरीबों को बैंकिंग व्यवस्था में शामिल होने के लिए प्रोत्साहन मिले।

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